भोग मार्ग रमणीय होता है और संयम मार्ग कठिनता पूर्ण होता है ================== "" "" "" "ब्रह्मचर्य का पालन ही आध्यात्म की श्रेष्ठ पायदान है, तथा ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए गुरु का सानिध्य (आध्यात्म मार्ग दर्शक) मिल जाय और ग्रन्थों का अध्ययन करने से मस्तिष्क की ग्रन्थियां खुलकर समय पाकर आत्मसाक्षात्कार तक की यात्रा भी साधक कर सकता है। परन्तु कोई कोई विरले महातपस्वी ही वहां तक पंहुच पाते है, कहावत यह भी प्रचलित है कि *"जिसका गुरु पहलवान, उसका चेला बलवान"* व शास्त्रार्थ में निपूर्ण होता है। और संसारिक जीवन जीते जी समाज सेवा करते हुए परोपकार की भावना से जीवन यापन करने वाले गृहस्थी भी भोग मार्ग में रहते हुए भी संयम से रहते हुए क्रिया शीलता से वासनाओं को नष्ट करते हुए आध्यात्म की राह पर सफलता पूर्वक चल सकते है। जितेन्द्रियता व संयम यह बुद्धी व शरीर को निरोगी रखकर उल्लासमय व उमंग के साथ ईश्वर आराधना की ओर ले जाता है, इसी से जीव का कल्याण होता है.. आईये इस प्रसंग में वेद क्या कहते है.... सामवेद उपदेश:-- इन्द्रो मदाय वावृधे शवसे वृत्रहा नृभि:। त...