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भोग मार्ग रमणीय होता है और संयम मार्ग कठिनता पूर्ण होता है
भोग मार्ग रमणीय होता है और संयम मार्ग कठिनता पूर्ण होता है
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"" "" "" "ब्रह्मचर्य का पालन ही आध्यात्म की श्रेष्ठ पायदान है, तथा ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए गुरु का सानिध्य (आध्यात्म मार्ग दर्शक) मिल जाय और ग्रन्थों का अध्ययन करने से मस्तिष्क की ग्रन्थियां खुलकर समय पाकर आत्मसाक्षात्कार तक की यात्रा भी साधक कर सकता है। परन्तु कोई कोई विरले महातपस्वी ही वहां तक पंहुच पाते है, कहावत यह भी प्रचलित है कि *"जिसका गुरु पहलवान, उसका चेला बलवान"* व शास्त्रार्थ में निपूर्ण होता है। और संसारिक जीवन जीते जी समाज सेवा करते हुए परोपकार की भावना से जीवन यापन करने वाले गृहस्थी भी भोग मार्ग में रहते हुए भी संयम से रहते हुए क्रिया शीलता से वासनाओं को नष्ट करते हुए आध्यात्म की राह पर सफलता पूर्वक चल सकते है। जितेन्द्रियता व संयम यह बुद्धी व शरीर को निरोगी रखकर उल्लासमय व उमंग के साथ ईश्वर आराधना की ओर ले जाता है, इसी से जीव का कल्याण होता है..
आईये इस प्रसंग में वेद क्या कहते है....
सामवेद उपदेश:--
इन्द्रो मदाय वावृधे शवसे वृत्रहा नृभि:।
तमिन्महत् स्वाजिषूतिमर्भे हवामहेस वाजेषुपप्रनोs विषत्।।
साम0 411
उपदेश = भोग मार्ग प्रारम्भ में रमणीय है, परन्तु उत्तरोत्तर उसकी रमणीयता कम होती जाती है। इसके विपरीत संयम-मार्ग में प्रारम्भ में नीरसता व कठिनता है, परन्तु उत्तरोत्तर उसका सौन्दर्य बढ़ता जाता है। इन्द्रियों को वश में करने वाला व्यक्ति आनन्द के लिए बढता चलता है। जितेन्द्रियता व संयम का परिणाम यही है कि जीवन अधिकाधिक उल्लासमय व क्रियाशील होता चलता है और यह क्रिया शीलता वासनाओं को नष्ट करती जाती है। यह संयम से मिलने वाला फल ही समजिये....
इसीलिए वासनाओं से संयम रखना जीवन को सुधरता है वह भोग वासनाओं का मार्ग दु:खों की ओर ले जाता है।
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जय श्री ब्रह्म ऋषि अंगिरा जी
मिशन.......
आध्यात्म का प्रचार-प्रसार करना
वैचारिक क्रांति चरित्र निर्माण सकारात्मकता का महाअभियान के लेखक... ⬇️
लेखक दलीचंद जांगिड़ सातारा महाराष्ट्र
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