कठोर परिश्रम से मन चाही मंझिल तक की यात्रा
✍️ लेखक की कलम से......
जन्म स्थान से स्थालान्तरित होना हि प्रगति का उगम स्थान (श्रौस्त्र) है जी, प्रगति के मूळ मे "कठोर परिश्रम" हि उसकी जड़ होती है।
जन्म स्थान से दूर जाने के कारण यह सम्भव होता है की वहा दूर देश में सभी लोग आपके लिए अनजान होते है वह सबका स्वभाव व सभी की आद्दतें भिन्न भिन्न होती है तथा यथा वहा की बोली, खान पान व संस्कारों में भी भिन्नता होती है जो आपने अभी तक देखे नहीं होते है, सब यही से आपका अपनों से दूर जीवन का एक नया अध्याय शुरु होता है जो पहले आपने ना कभी देखा व ना जाना पहचाना भी था, अब दूर प्रदेश में आप सब कुछ नया नया नए नए लोगों के साथ रहकर सिख रहे होते है।
भाषा,कला व संस्कृति का नया बैजोड़ ज्ञान आप हासिल कर रहे होते है जहा लाड प्यार व लिहाज की गुंजाइश नहीं के बराबर होती है व कुछ कर गुजरने की आपकी चाहत ही आपको आराम से नहीं बैठने देती है साथ ही सब नये लोगों का संग ही दिन रात आपको ईमानदारी के साथ कठोर मेहनत करने को आपको बाध्य करती है बस यही से आपके प्रगति का उगम समय काल शुरु होता है जहा आप चार अनजान लोगों से प्रेम पूर्वक दोस्ती करना, काम धन्धा सिखना वह रुपया पैसों का असली मूल्य को समजने का मौका मिलता है रुपया कमाने वह बचत करने की आपकी आद्दत सी बन जाती है यही कड़ी मेहनत ( संघर्ष.) आपको जीवन में हर क्षैत्र में सफलता दिलाती है।
कुछ लोग जन्म स्थान में रहकर आलस्यमय व निराशावादी विचार शक्ति के शिकार हो जाते है वह इसी कारण वे अपना जन्म स्थान नहीं छोड़ने की मन स्थिति बना लेते है साथ हि परिवार वालों का लाड, प्यार, मोह, लिहाज, का चक्रव्यूह घेर लेता है वह सफलता व प्रगति की राह में रोड़ा (स्पीड ब्रेक) अटकाए रखता है, खुलकर निशंकोच होकर काम करने की गति को अल्प विराम सा लग जाता है,व छोटा या हल्के दर्जे का काम करने में अपनों से शर्म लगती है इसीलिए प्रगति करने के शुरुआती पादान छूट जाते है फिर मन के विचारों में धीरे धीरे आलस्य व निराशा घर कर जाती है वह घर से दूर नहीं जाने की मन स्थिति बन जाती है यह सत्य घटना है, जो सर्वत्र देखने को मिल जाती है फिर मिली जूली प्रगति से हाथ मिलाना पड़ता है जी, मन को समाधान करना पड़ता है फिर वही आद्दत पक्की हो जाती है।
काम में शर्म रखना प्रगति का दुश्मन है........
इसीलिए मैं हमेशा कहता हूं की काम छोटा हो या बड़ा, काम तो काम होता है छोटे काम करने से ही बड़े काम मिलने के द्वार खुलते है जी इसीलिए निशंकोच होकर बिना लज्जित हुए छोटे काम से अवश्य शुरुवाद करे जरुर तथा आगे रास्ते मिलते जाएंगे वह एक दिन मन चाही मंझिल जरुर हासिल होगी इसमें तिलमात्र की शंका नही होनी चाहिए, हा अब आवश्यकता है *चिकाटी, ईमानदारी व कठोर परिश्रम की आद्दत का होना*..... यह गुण आप में होना अति आवश्यक है जी......
जैसे राम वन गये तो प्रभु श्री राम बन गए,
जो अपनों से दूर गए वो सफल बन गए।
कठोर "परिश्रम" हि प्रगति की कुंजी है.......
🏃🏾♂️ गुरु चरणम् गच्छामि.......
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जय श्री विश्वकर्मा जी री सा
लेखक दलीचंद जांगिड सातारा महाराष्ट्र

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